कैला देवी माता राजस्थान के करौली जिले में विराजमान हैं और लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र हैं। आइए जानते हैं माता के इतिहास, चमत्कारों और उनसे जुड़ी खास बातों के बारे में
त्रिकूट पर्वत पर वास
कैला देवी माता का भव्य मंदिर त्रिकूट पर्वत की घाटी में कालीसिल नदी के किनारे स्थित है। इन्हें भगवान कृष्ण की बहन (महामाया) और देवी दुर्गा का अवतार माना जाता है।
कैलादेवी से जुड़ी पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब कंस ने वासुदेव और देवकी की आठवीं संतान (जो कि एक कन्या के रूप में महामाया थीं) को पत्थर पर पटककर मारना चाहा, तो वह कन्या कंस के हाथों से छूटकर आकाश में विलीन हो गईं।
आकाशवाणी करते हुए उन्होंने कंस के वध की भविष्यवाणी की।
बाद में यही महामाया शक्तिपीठ के रूप में त्रिकूट पर्वत पर ‘कैला देवी’ के नाम से अवतरित हुईं।
मुख्य विशेषताएं और परंपराएं
जुड़वां स्वरूप: मंदिर के गर्भगृह में दो मूर्तियां हैं। दाईं ओर कैला देवी की मूर्ति है (जिनका मुख थोड़ा सा झुका हुआ है) और बाईं ओर चामुंडा माता की मूर्ति है।
लांगुरिया गीत: कैला देवी की आराधना में गाए जाने वाले ‘लांगुरिया’ गीत पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। यहाँ भक्त झूमते-नाचते हुए माता के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। लांगुरिया को माता का अनन्य भक्त (हनुमान जी का स्वरूप) माना जाता है।
लाक्खी मेला: हर साल चैत्र मास (मार्च-अप्रैल) में यहाँ उत्तर भारत का प्रसिद्ध ‘लाक्खी मेला’ भरता है, जिसमें राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से लाखों की तादाद में श्रद्धालु पहुँचते हैं।
भैरव और बोहरा भगत की छतरी: मंदिर के ठीक सामने बोहरा भगत की छतरी है, जहाँ मान्यता है कि लोग अपनी मन्नतें मांगते हैं और भूत-प्रेत की बाधाओं से मुक्ति पाते हैं।
भक्तों की अगाध श्रद्धा
कैला देवी को करौली के यदुवंशी (जादौन) राजाओं की कुलदेवी माना जाता है, लेकिन आज वे हर वर्ग और समुदाय की रक्षक के रूप में पूजी जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि जो भी सच्चे मन से माता के दरबार में आकर ‘कनक-दंडवत’ (लेटकर परिक्रमा) करता है, उसकी झोली कभी खाली नहीं रहती।

