माँ के आंसुओं और बेटी की रूह का गुनहगार है यूपी का सुस्त सिस्टम!

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से आई यह हृदयविदारक खबर न केवल रूह को कंपा देने वाली है, बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उन तमाम दावों की धज्जियां उड़ाती है जिनमें ‘पिंक बूथ’ और ‘मिशन शक्ति’ के नाम पर नारी सुरक्षा का दंभ भरा जाता है। अयोध्या की मासूम बेटी वैष्णवी सोनी, जो आंखों में सपने लेकर लखनऊ के पॉश इलाके गोमतीनगर में पढ़ाई करने आई थी, आज सिस्टम की भेंट चढ़ चुकी है।

मनचले पंकज यादव की प्रताड़ना से हारकर जब उस बेटी ने अगस्त 2025 में आखिरी सांस ली होगी, तब उसने यह कभी नहीं सोचा होगा कि उसकी मौत के बाद इंसाफ का रास्ता उसकी माँ के लिए एक अग्निपरीक्षा बन जाएगा। यह एक साधारण आत्महत्या नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश पुलिस की उस सड़ी-गली और संवेदनहीन कार्यप्रणाली द्वारा की गई ‘संस्थागत हत्या’ है, जिसने एक अपराधी को बचाने के लिए एक बेबस माँ को चार महीनों तक थाने की चौखट पर दर-दर भटकने के लिए छोड़ दिया।

सवाल यह उठता है कि आखिर योगीराज में उत्तर प्रदेश की हाईटेक पुलिस इतनी लाचार क्यों है? क्या अपराधियों को पकड़ने के लिए पुलिस के पास संसाधनों की कमी है, या फिर उनकी नीयत ही अपराधी को पालने की है? अगस्त में मौत हुई और एफआईआर दर्ज करने में जनवरी 2026 आ गई—यह देरी चीख-चीख कर कह रही है कि सिस्टम की फाइलों में संवेदना मर चुकी है। जिस ‘एंटी रोमियो स्क्वाड’ का ढोल पीटा जाता था, आज वह उसी खाकी की छतरी के नीचे दुबका बैठा है, जबकि हत्यारा पंकज यादव पुलिस के इकबाल को सरेआम चुनौती दे रहा है। आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि महीनों बीत जाने के बाद भी पुलिस के हाथ खाली हैं? क्या वह अपराधी इतना रसूखदार है कि उसे जमीन निगल गई या आसमान खा गया, या फिर हकीकत यह है कि वह पुलिस की ही ‘छतरी छाया’ में बैठकर कानून का मजाक उड़ा रहा है?
हाथरस और उन्नाव से लेकर अब लखनऊ की सड़कों तक, ये चीखती हुई माँएं सिर्फ इंसाफ मांग रही हैं, राजनीति नहीं। लेकिन विडंबना देखिए कि जहाँ अपराधियों के घरों पर बुलडोजर चलने के दावे किए जाते हैं, वहीं वैष्णवी का गुनहगार खुले आसमान के नीचे बेखौफ सांस ले रहा है।

क्या सरकार के बड़े-बड़े होर्डिंग्स सिर्फ विज्ञापन के लिए हैं? क्योंकि जमीन पर तो आज भी बेटियां असुरक्षित हैं और अपराधी पुलिस की सुस्ती का फायदा उठाकर सुरक्षित। यह घटना उत्तर प्रदेश पुलिस को कटघरे में खड़ा करती है और पूछती है कि आखिर कब तक वर्दीधारी रक्षक की जगह मूकदर्शक बने रहेंगे? एक माँ की ममता और उसकी सिसकियां आज लखनऊ के सत्ता के गलियारों से जवाब मांग रही हैं कि आखिर उसकी बेटी का गुनहगार कानून के शिकंजे से दूर क्यों है और इस सिस्टम की सुस्ती का हिसाब कौन देगा?

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