सोनी न्यूज़
स्टोरीज उत्तर प्रदेश जालौन

शव जिसकी जीविका का साधन है।

मीना बाबा किसी पहचान का मोहताज नही। क्यों कि 24×7 अपने काम को अंजाम देने के लिए तैयार रहते है। मीना के काम का समय निर्धारित नही है। झांसी के पूंछ से लेकर कानपुर के पामा स्टेशन तक जितनी भी मौतें ट्रेन से कट कर होती है उनको उठाने का जिम्मा उन्हीं का है। मीना बाबा बताते है कि उनके बाद तमाम लोगों ने इस काम को शुरू किया था कुछ मर गए कुछ के हौंसलों की
धार को समाज के तानो ने कुंद कर दी जिससे तंग आकर वो काम छोड़ गए।
लेकिन बाबा ने तो शव उठाना अपने जीवन का लक्ष्य चुन लिया था इसलिए आज भी काम करने का अंदाज़ वही है जो 60 के दशक में था। यही वजह है कि बेहद क्षति ग्रस्त हो चुके शवों को ठिकाने तक पहुचने में ज़रा नही हिचकिचाते ।
70 से ज्यादा वसंत देख चुके मीना बाबा के जीवन में हमेशा पतझड़ ही बना रहा। उनका अतीत भद्रलोक की भद्रता पर तमाचे जैसा है।
मीना ने बताया उनके पिता तेज राम कोंच में मुर्दा मवेशी का काम करते थे । परिवार बड़ा और आमदनी कम होने के कारण उस समय भी कभी कभी भूखा सोना पड़ता था। 60 के दशक की शुरुआत थी। अशिक्षित होने के कारण कोई काम नही था । उसी समय उरई आये और रिक्शा चलाना शुरू किया। काम शुरू किये कुछ समय गुज़रा ही था कि एक रोज़ एक दरोगा जी आये और बोले चलो लाश उठानी है। मन में आया मना कर दूँ लेकिन सोचा कि शहर में रिक्शा चलाना है। नही गया तो ये बाद में रोजगार न छीन लें क्यों कि भूख,प्यास,तिस्कार और छुआछूत से परेशान होकर ये नया काम शुरू किया था। वो भी हाथ से चला गया तो क्या करेंगें।


मई का महीना था जानलेवा लू गालो पर थपेड़े मार रही थी। बे-मन और दरोगा के हुक्म आगे बेबस होकर घटना स्थल पर पहुंचा। लाश एक बुजुर्ग की थी शायद भूख और प्यास के कारण मरा था। उस शव को रिक्शे पर लाद कर लाया और ठिकाने पर पहुंचा दिया। उस समय शहर की आबादी कम थी रिक्शे वाले भी गिने चुने थे। दो तीन बार मेरे रिक्शे पर शव देखकर मेरी पहचान लाश वाले रिक्शे के रूप में होना स्वभाविक बात थी।और हो भी गयी। इसलिए मुझे सवारी मिलना बंद हो गई।अब मेरे पास एक रोज़गार था दूसरे के घर मे मातम मेरे लिए जीवका का साधन बन गयी।
लाश उठाने के कार्यकाल में कभी भेदभाव नही किया। जाति, सप्रदाय, रईस,गरीब,हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई,पारसी सब के शवों को रिक्शे पर ढोया है लेकिन आज तक मजदूरी के सिवाय कुछ नही मिला। शव के पास दहाड़ मारकर रोने वाले लोग भी पैसे ठहराने से बाज़ नही आते। ये हमारे समाज की कथित सम्वेदन शीलता है। कभी किसी ने नही सोचा कि इसके भी पेट है और अब जाने कब इसे रोज़गार मिले। किसी ने कभी उनके बारे में नही सोचा।यही वजह रही कि मेहनत करने के लिए 24×7 दिन तैयार होने के बावजूद कई राते भूखे पेट सोना पड़ता था।

(मीना बाबा)
बाबा ने बताया कि जवानी ढलने के बाद उन्होंने शादी की। जिससे शादी की उसके पहले से ही दो लड़के थे जिनमें एक बीमार रहता था। शादी होने के बाद जितना कमाता था उसी की बीमारी में लगा देता था। औलाद सौतेली थी “लेकिन थी तो” बस यही सोच कर उसका इलाज कराता रहा। 2 बच्चे और पति पत्नी को सिर छुपाने की पूरे शहर में कोई जगह नही थी। रात होते ही जिसके बरामदे में सो जाता सुबह होते ही उसकी दुत्कार का सामना करना पड़ता। लेकिन जीवन को संघर्ष मान कर हर मुसीबत का सामना करता रहता था। 20 वर्ष इलाज के बाद बेटा भी दुनिया से चल बसा। मेरे जीवन का वो एक ऐसा मनहूस दिन था।जब अपनी औलाद के शव को रिक्शे में रखकर तन्हा जलाने गया। मेरे साथ परिवार और समाज का कोई व्यक्ति नही था। मेरे काम से नाराज़ और घृणा करने वाले ये नही सोचते कि कभी उनको अपनो के शव उठाने पड़ेंगे तो कैसा महसूस करेंगे।
50 साल से अधिक समय से रिक्शा मेरा साथी है अब उम्र और हिम्मत रिक्शा चलाने की इजाज़त नही देती लेकिन इस काम के सिवाय करू भी तो क्या इसलिए जब तक आखरी सांस ये काम छोड़ना नही चाहता।


जीवन मे अनगिनत शवो को ढोया है यदि शव उठाने का काम समाज सेवा में आता तो मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका होता। लेकिन
वाह- रे समाज अपना काम भी करवाता है, उसके बाद तिस्कार, घृणा, छुआछूत, का ईनाम भी देता है।

बाबा बताते है कि सरकार की दया हुई तो कांशीराम कलौनी में रहने का आसरा मिल लेकिन पड़ोसियों के व्यवहार से ऐसा लगा जैसे मै नही उनके पड़ोस में पोस्मार्टम हाउस खुल गया हो । इससे अच्छा तो सड़क के किनारे पड़ा रहना ठीक था। घृणा की परिकाष्ठा तो तब हो गई जब एक पड़ोसी ने कहा तुम्हे भी यही मरना था।
इन सारी बातों के बाद जीवन में इस निष्कर्ष पर पहुंचा मेहनत के बदले बराबर का इनाम,सेवा के बदले समाज मे मान, निस्वार्थ सेवा, मात्र किताबी बाते है। असल जीवन तो झूठ,फरेब,धोखा,चटुकारता की धुरी पर घूमता है।

रिपोर्ट:अलीम सिद्धकी(पत्रकार) उरई

Content Protection by DMCA.com

ये भी पढ़ें :

कानपुर देहात-लेखपाल को एंटी करप्शन टीम ने रिश्वत लेते रंगे हाथों किया गिरफ्तार

Ajay Swarnkar

कोंच की अस्थाई गौशाला बना गौवंश का मृत्यु शाला।

Ajay Swarnkar

नीलम लॉज में पकड़े गए एक नही दो नटवरलाल,अवैध ई-टिकट में पुलिस ने किया गिरफ्तार

Ajay Swarnkar

अपना कमेंट दें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.