📌फांसी के फंदों से भी नहीं डिगी आजादी की लौ
📌अड़ींग का किला आज भी 80 से अधिक क्रांतिकारियों के बलिदान का मांग रहा हिसाब
राम कुमार शर्मा, गोवर्धन soni news :
ब्रजभूमि के हृदय में बसा अड़ींग सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि 1857 की पहली स्वतंत्रता क्रांति की उस ज्वाला का साक्षी है, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी। अड़ींग का ऐतिहासिक किला आज भी उन वीर क्रांतिकारियों के बलिदान की कहानी अपने सीने में समेटे है, जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने विद्रोह का दमन करने के लिए फांसी के फंदे पर लटका दिया था। इतिहास और जनश्रुतियों में बलिदानियों की संख्या को लेकर अलग-अलग उल्लेख मिलते हैं, लेकिन 80 से अधिक क्रांतिकारियों को सामूहिक रूप से फांसी दिए जाने की बात प्रमुखता से सामने आती है।

30 मई 1857 को अड़ींग में भड़की थी विद्रोह की चिंगारी
मेरठ से उठी 1857 की क्रांति की लपटें जब ब्रजभूमि तक पहुंचीं तो अड़ींग और आसपास के क्षेत्र में भी अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बज उठा। क्रांतिकारियों ने आगरा ले जाए जा रहे करीब 4.30 लाख रुपये के राजकोष को लूट लिया। बताया जाता है कि तांबे के सिक्के और आभूषण छोड़ दिए गए थे। इससे स्पष्ट था कि विद्रोहियों का उद्देश्य धन अर्जित करना नहीं, बल्कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्वाभिमान की लड़ाई लड़ना था।

कलेक्टर भागा आगरा, गांवों पर बरपा अंग्रेजों का कहर
– अड़ींग और आसपास के क्षेत्र में विद्रोह की खबर से अंग्रेजी प्रशासन में खलबली मच गई। तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर थार्निल आगरा भाग गया। इसके बाद अंग्रेजी सेना ने विद्रोह को कुचलने के लिए दमन का रास्ता अपनाया। छाता की सराय में बैठे 22 जमींदारों को गोली मार दी गई। जेल तोड़ी गई और कोसी के पुलिस स्टेशन पर भी हमला हुआ। अंग्रेजों ने अड़ींग को भी अपने निशाने पर लिया और यहां के किले को फांसीघर में बदल दिया।

किले में फांसी के फंदे पर झूल गए वीर
अड़ींग के किले में अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को सामूहिक रूप से फांसी दी। जनश्रुतियों में यह संख्या 80 से अधिक बताई जाती है, जबकि कुछ इतिहास संदर्भों में इससे भी अधिक बलिदानियों का उल्लेख मिलता है। फांसी का भय दिखाकर अंग्रेज यह संदेश देना चाहते थे कि उनके शासन के खिलाफ आवाज उठाने वाले का यही हश्र होगा। मगर क्रांतिकारियों का बलिदान अंग्रेजी दमन से कहीं अधिक प्रभावशाली साबित हुआ और उनकी शहादत स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति का हिस्सा बन गई।

छह एकड़ में फैला था किला, अब सिमटकर तीन एकड़
बताया जाता है कि 16वीं शताब्दी में निर्मित अड़ींग का किला कभी करीब छह एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ था। मनसबदार फोंदाराम भी यहां तैनात रहे थे। समय के साथ किले का बड़ा हिस्सा जर्जर हो गया और इसका क्षेत्रफल भी सिमटकर करीब तीन एकड़ रह गया है। पुरातत्व विभाग ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया है, लेकिन संरक्षण के अभाव में इसकी दीवारें और अन्य अवशेष लगातार क्षतिग्रस्त हो रहे हैं।

खंडहर में बदलती विरासत पूछ रही सवाल
किले की टूटती दीवारें और बिखरे अवशेष सिर्फ एक इमारत के जर्जर होने की कहानी नहीं कहते, बल्कि उन बलिदानों की याद दिलाते हैं, जिनकी कीमत पर देश ने आजादी हासिल की। अड़ींग की मिट्टी में कृष्णकालीन भक्ति के साथ 1857 की क्रांति की गूंज भी समाई है। आज किला संरक्षण की बाट जोह रहा है। जरूरत है कि इसे महज पुरातात्विक अवशेष नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण स्मृति स्थल के रूप में विकसित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां यहां आकर उन गुमनाम वीरों के बलिदान को महसूस कर सकें। टूटा है किला, लेकिन इतिहास की गवाही आज भी बुलंद है।


