जानिए ये अमृत्व दिलाने वाला स्थान कौन सा है

                             ====ॐ नमः शिवाय जय====

===बाबा अमरनाथ भूखे को दे रोटी प्यासे को दे पानी जय बाबा बर्फानी======

आइये आपको दर्शन करवाते है बाबा अमरनाथ के जिनके दर्शन मात्र से सरे कष्टों से निजात मिल जाती है और वो स्थान है पहलगाम पुराणों के मुताबिक, शिव ने पार्वती को इसी परम पावन अमरनाथ की गुफा में अपनी साधना की अमर कथा सुनाई थी, जिसे हम अमरत्व कहते हैं।बताय जाता हैं कि भगवान भोलेनाथ ने अपनी सवारी नंदी को पहलगाम पर छोड़ दिया, जटाओं से चंद्रमा को चंदनवाड़ी में अलग कर दिया और गंगाजी को पंचतरणी में तथा कंठाभूषण सर्पों को शेषनाग पर छोड़ दिया।

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जानकारों के अनुसार दो सफेद कबूतर शिव जी से कथा सुन रहे थे और बीच-बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे। शिव जी को लगा कि माता पार्वती कथा सुन रही हैं और बीच-बीच में हुंकार भर रहीं हैं। इस तरह दोनों कबूतरों ने अमर होने की पूरी कथा सुन ली।कबूतर का जोड़ा अजर-अमर हो गया।महादेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप निवास करोगे। कहते हैं आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होते हैं। और इस तरह से यह गुफा अमर कथा की साक्षी हो गई व इसका नाम अमरनाथ गुफा के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

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शिव से पूछा, आप अजर-अमर हैं और मुझे हर जन्म के बाद नए स्वरूप में आकर फिर से वर्षों की कठोर तपस्या के बाद आपको प्राप्त करना होता है। मेरी इतनी कठोर परीक्षा क्यों? और आपके कंठ में पड़ी यह नरमुण्ड माला तथा आपके अमर होने का रहस्य क्या है?
भगवान शंकर ने माता पार्वती से एकांत और गुप्त स्थान पर अमर कथा सुनने को कहा जिससे
पुराणों में वर्णित है कि एक बार माता पार्वती ने भगवान कि अमर कथा कोई अन्य जीव न सुन पाए। क्योंकि जो कोई भी इस अमर कथा को सुन लेता है, वह अमर हो जाता।
पुराणों के मुताबिक, शिव ने पार्वती को इसी परम पावन अमरनाथ की गुफा में अपनी साधना की अमर कथा सुनाई थी, जिसे हम अमरत्व कहते हैं।

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कहते हैं भगवान भोलेनाथ ने अपनी सवारी नंदी को पहलगाम पर छोड़ दिया, जटाओं से चंद्रमा को चंदनवाड़ी में अलग कर दिया और गंगाजी को पंचतरणी में तथा कंठाभूषण सर्पों को शेषनाग पर छोड़ दिया।
इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा। अगला पड़ाव गणेश पड़ता है, इस स्थान पर बाबा ने अपने पुत्र गणेश को भी छोड़ दिया था, जिसको महागुणा का पर्वत भी कहा जाता है। पिस्सू घाटी में पिस्सू नामक कीड़े को भी त्याग दिया।
इस प्रकार महादेव ने जीवनदायिनी पांचों तत्वों को भी अपने से अलग कर दिया। इसके बाद मां पार्वती साथ उन्होंने गुप्त गुफा में प्रवेश कर किया और अमर कथा मां पार्वती को सुनाना शुरू किया।कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गई और वह सो गईं, जिसका शिवजी को पता नहीं चला। भगवन शिव अमर होने की कथा सुनाते रहे। उस समय दो सफेद कबूतर शिव जी से कथा सुन रहे थे और बीच-बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे। शिव जी को लगा कि माता पार्वती कथा सुन रही हैं और बीच-बीच में हुंकार भर रहीं हैं। इस तरह दोनों कबूतरों ने अमर होने की पूरी कथा सुन ली।कथा समाप्त होने पर शिव का ध्यान पार्वती की ओर गया, जो सो रही थीं। जब महादेव की दृष्टि कबूतरों पर पड़ी, तो वे क्रोधित हो गए और उन्हें मारने के लिए आगे बड़े। इस पर कबूतरों ने भगवान शिव से कहा कि, ‘हे प्रभु हमने आपसे अमर होने की कथा सुनी है यदि आप हमें मार देंगे तो अमर होने की यह कथा झूठी हो जाएगी। इस पर शिव जी ने कबूतरों को जीवित छड़ दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप निवास करोगे।

अत: यह कबूतर का जोड़ा अजर-अमर हो गया। कहते हैं आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होते हैं। और इस तरह से यह गुफा अमर कथा की साक्षी हो गई व इसका नाम अमरनाथ गुफा के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

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कुछ जानकारों का मानना हैकि अमरनाथ गुफा का सबसे पहले पता 16वीं शताब्दी में एक मुसलमान गड़रिए को पता चला था जिसके बाद इस गुफा के बारें में लोगों को पता चला मुसलमान गड़रिए एक दिन अपनी भेड़ों को चराते बहुत दूर निकल गया।जहां पर उसकी मुलाकात एक साधु से हुई।मुलाकात में उस साधु ने उसे कोयले से भरी एक कांगड़ी दी। जब वह घर पंहुचा तो उसमें कोयले की जगह सोना मिला तो हैरान रह गया वह अगले दिन उस साधु का धन्यवाद देने के लिए लौटा तो वहां साधु के बजाए एक विशाल गुफा देखी। तभी से यह एक तीर्थ बन गया।तभी से आज भी यात्रा पर आने वाले शिव भक्तों द्वारा चढ़ावे का एक हिस्सा इस मुसलमान के परिवार के वंशजों को दिया जाता है

ये थी सोनी न्यूज़ की खास रिपोर्ट

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